प्रेम और काम

 मनुष्य के शरीर में सबसे सर्वश्रेष्ठ ऊर्जा काम की शक्ति है। काम से नफरत नहीं करनी है काम के प्रति घृणा नहीं करनी है काम को जीवन मैं स्वीकार करना है। सबसे बड़ी ऊर्जा काम की शक्ति होती है। जिससे मनुष्य जीव पैदा करता है। काम की शक्ति के माध्यम से ही परमात्मा मनुष्य को जन्म देने के काबिल बनाता है। काम ही वह शक्ति है जिससे मनुष्य जीव को पैदा करता है। 

संभोग ही वह समय होता है जब मनुष्य परमात्मा के बहुत निकट होता है। मनुष्य जब अपनी पत्नी के साथ उस अनुभूति को महसूस कर लेता है तब उसकी तृप्ति खत्म हो जाती है और उसकी संभोग से रुचि खत्म होने लगती है। पुरुष जब अपनी पत्नी के साथ उसे स्थिति को महसूस कर लेता है उसकी तृप्ति जब खत्म हो जाती है तब उसे दुनिया की सारी स्त्रियां मां और बहन जैसी नजर आने लगते हैं। उस वक्त पति और पत्नी का प्रेम आध्यात्मिक तल पर पहुंच जाता है। 


मनुष्य की सबसे बड़ी ऊर्जा काम है ।काम से नफरत नहीं करनी है काम को पवित्र मानना है , उसे स्वीकार करना है।।यह वही ऊर्जा है जिससे जीव पैदा होते हैं।यह वही ऊर्जा है जिसके द्वारा परमात्मा मनुष्य को जन्म देने के काबिल बनाते हैं ।काम से नफरत नहीं करनी है । काम को राम तक ले जाना है।।

जैसे कोयला रूपांतरित होकर हीरा बन जाता है वैसे ही मनुष्य के भीतर जो शक्ति है काम की शक्ति सबसे सर्वश्रेष्ठ शक्ति है । वही रूपांतरित होकर मनुष्य को परमात्मा की ओर ले जाती है।।

प्रेम विवाह और सामाजिक विवाह में एक यही फर्क होता है सामाजिक विवाह शरीर के तल पर होता है और प्रेम विवाह प्रेम के तल पर होता है ।

सामाजिक विवाह शरीर से ज्यादा गहरा नहीं हो सकता और प्रेम विवाह क्योंकि मन से मां का मिलन होता है वहां प्रेम ज्यादा गहरा होता है।शरीर स्थिर होता है मन से ,मन चंचल होता है प्रेम लचीला होता है ।

सामाजिक विभाग पत्थर की तरह होता है जो जैसा है वैसा ही रहेगा और प्रेम विवाह फुल की तरह होता है जो जिंदा है फूल जन्मे का भी और मरेगा भी ।इसीलिए सामाजिक विवाह जीवन भर चलता है और प्रेम विवाह टूटने के कई चांस होते हैं ।क्योंकि प्रेम विवाह मन से मन का मिलन होता है और मन चंचल होता है।।

जहां प्रेम के बिना विवाह होता है, उसे विवाह में और वैश्या के पास जाने में थोड़ा भेद है जो की बुनियादी नहीं है। वैश्या को आप एक दिन के लिए खरीदते हैं और पत्नी को आप जीवन भर के लिए खरीदते हैं। जहां प्रेम नहीं है वहां खरीदना ही है। हालांकि साथ रहने से एक संबंध स्थापित हो जाता है लोग उसी को प्रेम कहने लगते हैं मगर वह प्रेम नहीं है। वह विवाह शरीर के तल पर है इसलिए संबंध कभी गहरा स्थापित नहीं हो पाता। विवाह संबंध का प्रमाण है प्रेम का नहीं।


जो लोग प्रेम करते हैं और फिर विवाह में बनते हैं उनका संबंध मन का ज्यादा गहरा हो जाता है। वह मन तक जाता है उसकी गहराई साइकोलॉजिकल है। विवाह दो शरीरों का हो सकता है दो आत्माओं का नहीं , दो आत्माओं के बीच में प्रेम होता है। 

प्रेम विवाह एक गहरा अर्थ ले लेता है वह मन तक जाता है।और विवाह अगर दो पंडितों और ज्योतिषियों के हिसाब से होता है धन के लेन देन के हिसाब से होता है, तो वैसा विवाह शरीर से ज्यादा गहरा नहीं हो सकता। लेकिन सामाजिक विवाह का एक फायदा है। क्योंकि शरीर "मन" से ज्यादा स्थिर होता है। इसलिए वह जीवन भर चल जाएगा। और जो विवाह प्रेम की नींव पर होता है वह कम टिकाऊ होता है क्योंकि प्रेम तरल है, प्रेम मन से होता है और मन चंचल होता है। शरीर पत्थर की तरह स्थिर होता है। और प्रेम फूल की तरह लचीला होता है। फूल जिंदा है तो वह जन्मे का भी और मरेगा भी। पत्थर वैसा का वैसा ही रहेगा। 

हालांकि जो पति-पत्नी, एक दूसरे के प्रेम से तृप्त हो जाते हैं, वही आत्मा के साथी कहलाते हैं। जब जब पुरुष अपनी पत्नी के प्रेम से तृप्त हो जाता है तो उसे दुनिया की सारी स्त्री मां और बहन के समान नजर आते हैं

।सामाजिक तौर पर किए विवाह और प्रेम विवाह में बहुत फर्क होता है। सामाजिक विवाह करने में और एक वैश्या के पास जाने में थोड़ा ही अंतर है। वैश्या को आप एक दिन के लिए खरीदते हैं और पत्नी को आप सारी जीवन के लिए खरीदते हैं। दोनों में खरीदना ही है। सामाजिक विवाह शरीर के तल पर होता है। और शरीर के तल पर होने वाला विवाह कभी गहरा नहीं हो सकता। 

प्रेम विवाह  का अर्थ गहरा होता है। क्योंकि इसमें मन का मन से मिलन  होता है। इसमें आत्मा का मिलनह




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